चुनाव आयोग देश की चुनाव व्यवस्था की अहम संवैधानिक संस्था है। आयोग में मतभेद का इतिहास कई दशक पुराना है। 1989 में बहुसदस्यीय व्यवस्था शुरू होने के बाद विवाद सामने आए। इनमें अधिकारों और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े सवाल प्रमुख रहे। टीएन शेषन का दौर इस इतिहास में खास रहा। इसके बाद गोपालस्वामी-चावला और लवासा-अरोड़ा विवाद भी चर्चा में आए। 2026 में दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों ने फिर ध्यान खींचा है।
1989 में बहुसदस्यीय आयोग की शुरुआत कैसे हुई?
अक्टूबर 1989 में एसएस धनाओआ और वीएस सीगल को चुनाव आयुक्त बनाया गया। उस समय आरवीएस पेरी शास्त्री मुख्य चुनाव आयुक्त थे। हालांकि, यह व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चली।
राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनने के बाद दोनों आयुक्तों की नियुक्तियां वापस ले ली गईं। धनाओआ ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अदालत ने बाद में नियुक्तियां समाप्त करने के फैसले को बरकरार रखा।
1993 में आयोग फिर तीन सदस्यीय बना। टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे। एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया।
इसके बाद आयोग के अधिकारों को लेकर गंभीर कानूनी विवाद शुरू हुआ। शेषन ने बहुसदस्यीय व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
शेषन के दौर में विवाद इतना बढ़ा क्यों?
शेषन और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच कामकाज को लेकर मतभेद हुए। शेषन खुद को आयोग की शक्तियों का प्रमुख केंद्र मानते थे। वहीं नई व्यवस्था में तीनों सदस्यों की भूमिका को बराबरी दी गई थी।
इसी दौर से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों में “दो गधे” वाली टिप्पणी का उल्लेख मिलता है। यह टिप्पणी एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति के संदर्भ में बताई जाती है।
विवाद केवल व्यक्तिगत टिप्पणियों तक सीमित नहीं था। इसके केंद्र में आयोग की संरचना और अधिकारों का सवाल था।
सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी और आयुक्तों की भूमिका कैसे तय की?
1995 में सुप्रीम कोर्ट ने टीएन शेषन की याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला दिया। अदालत ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था को बरकरार रखा।
फैसले के बाद सीईसी और अन्य चुनाव आयुक्तों की निर्णय प्रक्रिया स्पष्ट हुई। सभी सदस्यों को निर्णय लेने में समान भूमिका मिली। मतभेद की स्थिति में बहुमत का फैसला लागू होने की व्यवस्था रही।
इस फैसले ने आयोग के भीतर शक्ति संतुलन को महत्वपूर्ण आधार दिया। सीईसी आयोग के अध्यक्ष होते हैं। हालांकि, उन्हें अन्य आयुक्तों पर अलग निर्णायक अधिकार नहीं दिया गया।
आयोग में मतभेद किन मुद्दों पर सामने आए?
- अधिकारों का सवाल: सीईसी और अन्य आयुक्तों की भूमिका कई बार चर्चा में रही।
- निर्णय प्रक्रिया: आयोग के भीतर सहमति और बहुमत का मुद्दा महत्वपूर्ण रहा।
- आचार संहिता: 2019 में असहमति दर्ज करने को लेकर विवाद हुआ।
- मतदाता सूची: 2026 में एसआईआर और मतदाता डेटा से जुड़े सवाल उठे।
- तकनीकी व्यवस्था: केंद्रीयकृत सॉफ्टवेयर और डेटा नियंत्रण भी बहस का विषय बना।
इन सभी घटनाओं की परिस्थितियां अलग-अलग थीं। इसलिए उन्हें एक ही तरह के विवाद के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
गोपालस्वामी और नवीन चावला के बीच क्या हुआ?
2009 में तत्कालीन सीईसी एन गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश की। उन्होंने चावला पर कथित पक्षपात का आरोप लगाया था।
यह सिफारिश लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले सामने आई। सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सरकार की सलाह पर सिफारिश खारिज कर दी।
इसके बाद नवीन चावला ने अप्रैल 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। इस घटनाक्रम ने आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर बहस बढ़ाई।
गोपालस्वामी की सिफारिश में लगाए गए आरोपों को चावला ने स्वीकार नहीं किया था। इसलिए इस प्रकरण में आरोप और आधिकारिक फैसले अलग-अलग स्तरों पर समझना जरूरी है।
2019 में लवासा और अरोड़ा का विवाद क्या था?
2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान अशोक लवासा और सुनील अरोड़ा के बीच मतभेद सामने आए। लवासा ने आदर्श आचार संहिता से जुड़े मामलों में अपनी अलग राय दर्ज कराने की मांग की।
मई 2019 में आयोग ने फैसला किया कि असहमति बैठक की कार्यवाही में दर्ज होगी। हालांकि, उसे अंतिम आदेशों में सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।
लवासा बाद में चुनाव आयोग से बाहर हो गए। उन्होंने 2020 में एशियाई विकास बैंक में उपाध्यक्ष का पद संभाला।
इस मामले ने आयोग में अलग राय दर्ज करने की प्रक्रिया पर बहस को सामने रखा।
2024 में अरुण गोयल के इस्तीफे की क्या वजह थी?
अरुण गोयल ने मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त पद से इस्तीफा दिया था। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस्तीफा निजी कारणों से दिया गया था।
उनके इस्तीफे के बाद आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सार्वजनिक चर्चा हुई। हालांकि, उनके और तत्कालीन सीईसी के संबंधों को लेकर सामने आए कई दावे अटकलों पर आधारित थे।
इसलिए उन दावों को स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं है।
2026 में फिर क्यों चर्चा में आया आयोग?
सितंबर 2026 में द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों का विवरण प्रकाशित किया। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम से कम 14 औपचारिक आपत्तियां दर्ज कीं।
रिपोर्ट में इन आपत्तियों का संबंध मतदाता पंजीकरण और नाम हटाने से बताया गया। इसमें फॉर्म-6 और मतदाता डेटा के केंद्रीकरण से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने कुछ फैसलों को अपनी जानकारी के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए। हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा कि ये सुझाव थे। आयोग ने यह भी कहा कि पिछले वर्ष के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
आयोग में मतभेद और एसआईआर का क्या संबंध है?
मौजूदा विवाद का एक बड़ा हिस्सा विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के ड्राफ्ट रोल में 13 करोड़ से ज्यादा नाम कम हुए।
यह आंकड़ा ड्राफ्ट मतदाता सूची से संबंधित है। इसे अंतिम रूप से मतदाता नाम हटाने के समान नहीं माना जाना चाहिए।
2026 में फॉर्म-6 को लेकर भी आपत्तियां दर्ज की गईं। नए मतदाताओं के पंजीकरण में एसआईआर से जुड़े सवाल जोड़े जाने पर सवाल उठे।
चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर प्रक्रिया को लेकर अलग पक्ष रखा है। दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। इन राजनीतिक आरोपों और आयोग के जवाब को अलग-अलग समझना जरूरी है।
1989 से 2026 तक विवादों का सिलसिला
- 1989: एसएस धनाओआ और वीएस सीगल चुनाव आयुक्त बने।
- 1990: दोनों आयुक्तों की नियुक्तियां वापस ले ली गईं।
- 1993: एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति चुनाव आयुक्त बने।
- 1995: सुप्रीम कोर्ट ने बहुसदस्यीय आयोग की व्यवस्था बरकरार रखी।
- 2009: गोपालस्वामी ने चावला को हटाने की सिफारिश की।
- 2019: लवासा ने आचार संहिता मामलों में अलग राय दर्ज कराने की मांग की।
- 2020: लवासा ने चुनाव आयुक्त पद से इस्तीफा दिया।
- 2024: अरुण गोयल ने चुनाव आयुक्त पद छोड़ा।
- 2026: संधू और जोशी की औपचारिक आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आई।
विवादों से क्या तस्वीर सामने आती है?
चुनाव आयोग के इतिहास में असहमति अलग-अलग रूपों में सामने आई है। कभी विवाद अधिकारों को लेकर रहा। कभी निर्णय प्रक्रिया केंद्र में रही।
कुछ मामलों में व्यक्तिगत मतभेद भी सार्वजनिक हुए। वहीं कुछ मामलों में संस्थागत नियमों को लेकर सवाल उठे।
2026 की घटनाओं में मतदाता सूची और तकनीकी व्यवस्था प्रमुख मुद्दे हैं। आयोग ने अपनी प्रतिक्रिया में फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है।
इसलिए चुनाव आयोग के भीतर विवादों को समझते समय संबंधित दौर के नियम और परिस्थितियां देखना जरूरी है। यही नजरिया 1989 से 2026 तक की घटनाओं को समझने में मदद करता है।

