पश्चिम बंगाल के मालदा में न्यायिक अधिकारियों के साथ हुई हिंसा और उन्हें घंटों तक बंधक बनाए जाने की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस पूरे घटनाक्रम को न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताया है।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने प्रशासनिक लापरवाही पर तीखी टिप्पणी करते हुए मालदा के जिलाधिकारी (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि जब हालात नियंत्रण से बाहर थे, तब ये अधिकारी मौके पर क्यों नहीं पहुंचे। कोर्ट ने इस रवैये को न्यायालय के प्रति असम्मानजनक बताते हुए इसे “अदालत को चुनौती” जैसा करार दिया।
यह मामला चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया के दौरान सामने आया, जब सात न्यायिक अधिकारियों को लगभग नौ घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया। इन अधिकारियों में तीन महिला न्यायिक अधिकारी भी शामिल थीं। अदालत ने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि उन्हें बिना सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं के छोड़ देना बेहद चिंताजनक है।
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने कहा कि यह घटना केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं है, बल्कि न्यायपालिका के कामकाज में बाधा डालने का प्रयास भी प्रतीत होती है। कोर्ट के अनुसार, प्रशासन को पहले से सूचना होने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
इस मामले में अदालत ने राज्य के शीर्ष अधिकारियों—मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक—को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। साथ ही अगली सुनवाई में उनकी वर्चुअल उपस्थिति अनिवार्य करते हुए विस्तृत जवाब मांगा गया है।
सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त निर्देश जारी करते हुए चुनाव आयोग को न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती सुनिश्चित करने को कहा है। इसके अलावा संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा बढ़ाने, आम आवाजाही सीमित करने और अधिकारियों व उनके परिवारों की सुरक्षा का तत्काल आकलन करने के आदेश दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका के काम में किसी भी तरह की बाधा या दबाव को गंभीरता से लिया जाएगा और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

