Somnath Temple को भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। सोमनाथ मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है और इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला ज्योतिर्लिंग कहा जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण सबसे पहले चंद्र देव ने सोने से कराया था। बाद में रावण ने चांदी, भगवान कृष्ण ने लकड़ी और राजा भीमदेव ने पत्थरों से इसका पुनर्निर्माण कराया। सदियों पुराना यह मंदिर आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
महमूद गजनवी के हमले ने बदल दिया इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार, सोमनाथ मंदिर पर सबसे बड़ा हमला 1026 में महमूद गजनवी ने किया था। उसने मंदिर की संपत्ति लूटने के साथ भारी तबाही मचाई थी। कहा जाता है कि उस हमले में हजारों भक्त मारे गए और मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया।
इसके बाद भी मंदिर कई बार बना और टूटा। अलाउद्दीन खिलजी, मुजफ्फर शाह और औरंगजेब के शासनकाल में भी इस मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया। लेकिन हर बार श्रद्धालुओं और हिंदू राजाओं ने इसे दोबारा खड़ा किया। यही वजह है कि सोमनाथ मंदिर भारतीय स्वाभिमान और सनातन संस्कृति की ताकत का प्रतीक माना जाता है।
अहिल्याबाई होलकर ने कराया पुनर्निर्माण
18वीं सदी में Ahilyabai Holkar ने मंदिर के पास नया मंदिर बनवाया। उन्होंने पुराने ध्वस्त ढांचे को बचाने के लिए अलग स्थान पर पूजा स्थल तैयार कराया।
इसके बाद आजादी के बाद Vallabhbhai Patel ने सोमनाथ मंदिर के भव्य पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। उन्होंने इसे देश के सांस्कृतिक गौरव से जोड़ा और पुनर्निर्माण के लिए ट्रस्ट का गठन किया गया।
नेहरू और राजेंद्र प्रसाद के बीच बना विवाद
भारत के पहले प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru मंदिर पुनर्निर्माण को सरकारी कार्यक्रम से जोड़ने के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि धर्मनिरपेक्ष सरकार को धार्मिक आयोजनों से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
हालांकि, राष्ट्रपति Rajendra Prasad ने अलग विचार रखते हुए 1951 में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया। यह घटना स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में भी अहम मानी जाती है।
आज भी दुनिया को देता है आस्था का संदेश
1995 में मंदिर का पुनर्निर्माण पूरी तरह पूरा हुआ और इसे राष्ट्र को समर्पित किया गया। वर्तमान में सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष Narendra Modi हैं।
हाल ही में आयोजित सोमनाथ अमृत महोत्सव ने एक बार फिर सोमनाथ मंदिर को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने यहां पूजा-अर्चना कर इसे भारत की सनातन परंपरा और अटूट आस्था का प्रतीक बताया।

