लिव-इन कानूनी अधिकार: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से महिलाओं की सुरक्षा में क्या बदलेगा?

CG DARSHAN
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सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता दी है। अदालत ने कहा कि हर लिव-इन संबंध को आपराधिक कानून का संरक्षण नहीं मिलेगा। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में महिलाओं को घरेलू क्रूरता के मामलों में भारतीय न्याय संहिता के तहत राहत मिल सकती है।

यह फैसला कर्नाटक के एक मामले की सुनवाई के दौरान आया। अदालत ने माना कि यदि कोई संबंध व्यवहार में विवाह जैसा हो और दोनों पक्षों का शादी करने का वास्तविक इरादा हो, तो महिला कानूनी संरक्षण पाने की पात्र हो सकती है। इसलिए यह निर्णय भविष्य के ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

किन मामलों में मिलेगा महिलाओं को संरक्षण?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल साथ रहना पर्याप्त नहीं होगा। अदालत प्रत्येक मामले के तथ्यों की जांच करेगी।

संरक्षण के लिए प्रमुख शर्तें इस प्रकार हैं।

  • दोनों व्यक्ति बालिग हों।
  • दोनों अपनी इच्छा से साथ रह रहे हों।
  • संबंध विवाह जैसा प्रतीत हो।
  • दोनों का शादी करने का वास्तविक इरादा हो।

यदि ये परिस्थितियां मौजूद हों, तो अदालत महिला को आपराधिक कानून के तहत राहत देने पर विचार कर सकती है।

लिव-इन कानूनी अधिकार तय करने में किन बातों पर होगा विचार?

अदालत कई पहलुओं का मूल्यांकन करेगी।

  • दोनों कितने समय तक साथ रहे।
  • क्या वे एक ही घर में रहते थे।
  • क्या घरेलू जिम्मेदारियां साझा थीं।
  • क्या आर्थिक सहयोग या निर्भरता थी।
  • समाज उन्हें किस रूप में पहचानता था।
  • क्या संबंध स्थायी प्रकृति का था।

इन तथ्यों के आधार पर यह तय होगा कि संबंध विवाह जैसा था या नहीं।

घरेलू हिंसा कानून और बीएनएस की धारा में अंतर

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता अलग-अलग उद्देश्य पूरे करते हैं।

घरेलू हिंसा अधिनियम महिला को संरक्षण, निवास और भरण-पोषण जैसी राहत देता है। दूसरी ओर, भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धारा आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान करती है। इसमें एफआईआर, जांच और दोष सिद्ध होने पर सजा भी शामिल है। इसलिए दोनों कानून समान नहीं माने जा सकते।

फैसले का महिलाओं और न्याय व्यवस्था पर असर

यह फैसला उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो लंबे समय से विवाह जैसे संबंध में रह रही हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय सभी लिव-इन संबंधों पर स्वतः लागू नहीं होगा।

साथ ही, अदालत ने गिरफ्तारी को लेकर पहले से तय दिशा-निर्देशों का पालन करने पर भी जोर दिया है। यानी शिकायत मिलने के बाद पुलिस पहले प्रारंभिक जांच करेगी। इसके बाद ही आगे की कानूनी कार्रवाई होगी।

मुख्य बातें

  • सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन संबंधों पर नई कानूनी व्याख्या दी।
  • हर लिव-इन संबंध को आपराधिक संरक्षण नहीं मिलेगा।
  • विवाह जैसे संबंधों को विशेष परिस्थितियों में राहत मिलेगी।
  • अदालत प्रत्येक मामले के तथ्यों की अलग जांच करेगी।
  • गिरफ्तारी से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य रहेगा।

एक नजर में

  • फैसला महिलाओं की कानूनी सुरक्षा से जुड़ा है।
  • शादी का वास्तविक इरादा महत्वपूर्ण माना गया।
  • संपत्ति और उत्तराधिकार कानून पर इसका सीधा असर नहीं होगा।
  • घरेलू हिंसा अधिनियम और आपराधिक कानून अलग-अलग रहेंगे।

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