नई दिल्ली में हो रहा ब्रिक्स समिट 2026 वैश्विक चर्चा का केंद्र बना है। खासतौर पर अमेरिका की नजर भारत और चीन के संबंधों पर है। अमेरिकी मीडिया ने सम्मेलन से जुड़े कई अहम पहलुओं को सामने रखा है।
अमेरिकी अखबारों ने बैठक को बदलती विश्व व्यवस्था से जोड़कर देखा है। इसमें वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा अहम है। क्षेत्रीय संघर्ष और ऊर्जा संकट भी चर्चा के प्रमुख विषय हैं।
द न्यूयॉर्क टाइम्स ने मोदी और शी जिनपिंग की भूमिका पर ध्यान दिया। रिपोर्ट में विकासशील देशों के नेतृत्व को लेकर सवाल उठाया गया। इसके अलावा ब्रिक्स के बढ़ते प्रभाव पर भी चर्चा हुई।
भारत चीन रिश्तों को लेकर चीन की चिंता क्यों बढ़ी?
अमेरिकी रिपोर्टों के अनुसार, चीन की बड़ी चिंता भारत का अमेरिका की ओर झुकाव है। बीजिंग भारत के साथ संबंधों में सुधार का अवसर तलाश रहा है।
चीन ब्रिक्स को अमेरिकी प्रभाव के सामने एक मजबूत मंच मानता है। वहीं भारत संगठन को ज्यादा व्यापक और खुला रखना चाहता है। भारत किसी एक वैश्विक गुट में शामिल होने से बचना चाहता है।
युद्ध, ऊर्जा कीमतों और अमेरिकी टैरिफ ने भी समीकरण बदले हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी प्रतिस्पर्धा भी महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे माहौल में भारत की रणनीतिक भूमिका बढ़ गई है।
शी जिनपिंग का भारत दौरा भी इस वजह से अहम माना जा रहा है। सात साल बाद उनका भारत आना दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। 2020 के सीमा तनाव के बाद रिश्तों में काफी खटास आई थी।
हालांकि, 2024 के बाद दोनों देशों ने बातचीत बढ़ाई है। इससे संबंधों में धीरे-धीरे सुधार की उम्मीद बनी है।
भारत चीन रिश्ते सुधारने में कौन सी चुनौतियां हैं?
भारत और चीन के संबंधों में अभी कई मुश्किलें मौजूद हैं। सीमा विवाद इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा बना हुआ है।
इसके अलावा चीन के पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध भी चुनौती हैं। हिंद महासागर में दोनों देशों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी जारी है।
अमेरिकी मीडिया के अनुसार, मौजूदा सुधार को स्थायी बदलाव मानना जल्दबाजी होगी। दोनों देश अपने रणनीतिक हितों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रहे हैं।
ट्रंप प्रशासन के दौरान भारत-अमेरिका संबंधों में बदलाव
वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भारत और अमेरिका के रिश्तों में आए बदलाव पर भी चर्चा की। रिपोर्ट के अनुसार, कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़े।
भारत की रूसी तेल खरीद भी विवाद का एक प्रमुख विषय रही है। ऐसे में नई दिल्ली अपनी विदेश नीति में संतुलन साध रही है।
भारत के रूस और ईरान के साथ पुराने संबंध हैं। वहीं अमेरिका और यूरोप के साथ साझेदारी भी लगातार बढ़ रही है। जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी भारत के रिश्ते मजबूत हैं।
- भारत-चीन संबंधों के प्रमुख मुद्दे
- सीमा विवाद अभी पूरी तरह हल नहीं हुआ है।
- चीन और पाकिस्तान के करीबी रिश्ते भारत के लिए चुनौती हैं।
- हिंद महासागर में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जारी है।
- अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा का असर पड़ रहा है।
- ब्रिक्स के सामने बड़ी चुनौतियां
- 11 सदस्य देशों के हित अलग-अलग हैं।
- राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं में अंतर है।
- यूक्रेन युद्ध पर सभी देशों की राय समान नहीं है।
- मध्य पूर्व के संघर्ष से भी मतभेद उभर सकते हैं।
ब्रिक्स में भारत के लिए संतुलन साधना मुश्किल
वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एपी की रिपोर्ट ने भारत की स्थिति पर ध्यान दिया। रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिक्स में कई प्रभावशाली देशों के नेता शामिल हैं।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान भी इसमें शामिल हैं। शी जिनपिंग की मौजूदगी ने बैठक का रणनीतिक महत्व बढ़ाया है।
पीएम मोदी ने सम्मेलन से पहले पुतिन और पेजेश्कियान से अलग-अलग बातचीत की। इससे भारत की बहुपक्षीय कूटनीति का संकेत मिलता है।
भारत एक साथ कई देशों के साथ अपने संबंध आगे बढ़ा रहा है। इसलिए ब्रिक्स में सभी पक्षों के बीच संतुलन बनाना अहम होगा।
कुल मिलाकर, भारत चीन रिश्ते इस सम्मेलन के प्रमुख रणनीतिक मुद्दों में शामिल हैं। हालांकि, भारत की भूमिका केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं है।
नई दिल्ली ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती है। साथ ही, वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ साझेदारी भी बनाए रखना चाहती है।
इसी संतुलन के कारण ब्रिक्स समिट 2026 पर दुनिया की नजर बनी हुई है।

