उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में RSS प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं को संबोधित किया। मोहन भागवत धर्म को लेकर अपनी बात रखते हुए उन्होंने इसके व्यापक अर्थ को समझाया। उन्होंने धर्म और रिलीजन को अलग अवधारणाएं बताया।
देवास रोड स्थित गीता भवन में तीन दिवसीय युवा धर्म संसद का आयोजन हो रहा है। इसमें देशभर से युवा, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य शामिल हुए हैं। कार्यक्रम में धर्म के साथ आधुनिक विषयों पर भी संवाद हो रहा है।
मोहन भागवत धर्म को जीवन से जोड़ने की बात
भागवत ने कहा कि धर्म को केवल पूजा और कर्मकांड तक सीमित नहीं करना चाहिए। उनके अनुसार, धर्म का संबंध व्यक्ति के पूरे जीवन से है। उन्होंने युवाओं से धर्म की अवधारणा को समझने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि धर्म किसी व्यक्ति को बांधने का काम नहीं करता। उनके अनुसार, धर्म व्यक्ति को मुक्ति और सही आचरण की दिशा देता है। उन्होंने धर्म को अस्तित्व से जुड़ा विषय भी बताया।
धर्म और रिलीजन को लेकर भागवत की व्याख्या
भागवत ने कहा कि आमतौर पर धर्म को रिलीजन का पर्याय समझ लिया जाता है। उन्होंने दोनों के बीच अंतर बताया। उनके अनुसार, रिलीजन किसी मत या धार्मिक परंपरा से जुड़ा हो सकता है।
उन्होंने कहा कि धर्म की अवधारणा इससे अधिक व्यापक है। उन्होंने रिलीजन शब्द को ‘रिलीगो’ से जोड़ते हुए अपनी व्याख्या रखी। उनके अनुसार, धर्म बांधता नहीं बल्कि मुक्त करता है।
युवाओं के लिए धर्म क्यों जरूरी बताया
भागवत ने कहा कि धर्म केवल बुजुर्गों के लिए नहीं है। उन्होंने गीता और रामायण को भी युवाओं के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, धर्म जीवन के आरंभ से अंत तक जुड़ा रहता है।
उन्होंने युवाओं से पहले से बनी धारणाओं पर विचार करने की बात कही। उनके मुताबिक, नए विचारों को समझने के लिए मन को खुला रखना जरूरी है।
कार्यक्रम से जुड़े प्रमुख बिंदु:
- युवा धर्म संसद का आयोजन 17 से 19 सितंबर तक हो रहा है।
- कार्यक्रम में देश के कई राज्यों से युवा शामिल हुए हैं।
- धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा पर चर्चा हो रही है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े विषयों पर भी संवाद रखा गया है।
- शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य कार्यक्रम का हिस्सा हैं।
कर्मकांड को धर्म का पूरा स्वरूप नहीं माना
भागवत ने धर्म और कर्मकांड के संबंध पर भी बात रखी। उन्होंने कहा कि कर्मकांड धर्म के अभ्यास का एक हिस्सा है। हालांकि, इसे धर्म का पूरा स्वरूप नहीं माना जा सकता।
उन्होंने युवाओं को धर्म को केवल बाहरी गतिविधियों से नहीं समझने की बात कही। उनके अनुसार, धर्म का संबंध व्यक्ति के आचरण और जिम्मेदारी से भी है।
मोहन भागवत धर्म के जरिए मुक्ति की बात
अपने संबोधन में भागवत ने धर्म को मुक्ति से जोड़ा। उन्होंने कहा कि इच्छाओं, भय या किसी अन्य कारण से धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। उन्होंने धर्म को जीवन के स्थायी सिद्धांत के रूप में समझाने की कोशिश की।
उन्होंने महाभारत के अंतिम पांच श्लोकों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इन श्लोकों में महाभारत का सार बताया गया है।
किसी को पीड़ा नहीं देना धर्म का पक्ष
भागवत ने कहा कि दूसरों को पीड़ा नहीं पहुंचाना धर्म का महत्वपूर्ण पक्ष है। उन्होंने धर्म को केवल व्यक्तिगत आस्था के बजाय आचरण से जोड़कर समझाया।
उन्होंने युवाओं को धर्म के विषय में जिज्ञासा रखने और सवाल पूछने की बात कही। साथ ही, उन्होंने नई जानकारी को खुले मन से समझने पर जोर दिया।
उज्जैन में जुटे बड़ी संख्या में युवा
युवा धर्म संसद में देश के अलग-अलग हिस्सों से युवा पहुंचे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, आयोजन में करीब 1600 से 1700 युवा शामिल हुए हैं। इनके साथ शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य भी कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे हैं।
कार्यक्रम में धर्म के अलावा एआई और सूचना-विचार संघर्ष जैसे विषयों पर भी चर्चा हो रही है। इस तरह आयोजन में पारंपरिक विषयों के साथ आधुनिक मुद्दों को भी शामिल किया गया है।
मोहन भागवत धर्म के संदर्भ में अपने संबोधन के दौरान युवाओं को धर्म की व्यापक अवधारणा समझाते नजर आए। उन्होंने धर्म और रिलीजन को अलग बताते हुए इसे जीवन और आचरण से जोड़कर समझाया।

