केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात शुल्क में बदलाव करते हुए पेट्रोल पर लगने वाली स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) को शून्य कर दिया है। दूसरी ओर, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर शुल्क बढ़ाया गया है। वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, नई दरें तत्काल प्रभाव से लागू की गई हैं।
पेट्रोल, डीजल और एटीएफ की नई निर्यात दरें
सरकार के ताजा फैसले के बाद तीनों ईंधन उत्पादों पर निर्यात शुल्क की स्थिति बदल गई है। नई दरों का विवरण इस प्रकार है:
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पेट्रोल: निर्यात शुल्क ₹2.50 प्रति लीटर से घटाकर शून्य कर दिया गया है।
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डीजल: शुल्क में ₹3 प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। अब यह ₹8.50 से बढ़कर ₹11.50 प्रति लीटर हो गया है।
- एटीएफ: हवाई ईंधन के निर्यात शुल्क में 50 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। अब यह ₹10.50 से बढ़कर ₹11 प्रति लीटर हो गया है।
निर्यात शुल्क में बदलाव की वजह क्या है?
सरकार ने निर्यात शुल्क की दरों में यह संशोधन ऐसे समय किया है, जब अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया के हालात का असर तेल की आपूर्ति पर पड़ रहा है। केंद्र सरकार ने 27 मार्च 2026 से पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर ये शुल्क लागू किए थे। इसका उद्देश्य निर्यात को हतोत्साहित करके देश में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना था।
इन दरों की समय-समय पर समीक्षा की जाती है। सरकारी जानकारी के अनुसार, शुल्क तय करते समय पिछली समीक्षा अवधि के दौरान कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल और एटीएफ की औसत अंतरराष्ट्रीय कीमतों को आधार बनाया जाता है। इसलिए अलग-अलग ईंधनों की दरों में बदलाव एक जैसा नहीं होता।
नए फैसले का घरेलू ईंधन कीमतों पर क्या असर होगा?
यह बदलाव निर्यात पर लागू शुल्क से संबंधित है। इसे घरेलू पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले टैक्स में बदलाव नहीं समझना चाहिए। सरकार की पिछली अधिसूचनाओं में भी स्पष्ट किया गया है कि घरेलू खपत के लिए जारी पेट्रोल और डीजल पर मौजूदा उत्पाद शुल्क दरें अलग हैं। इसलिए केवल निर्यात शुल्क में बदलाव के आधार पर पेट्रोल पंपों पर कीमतें घटने या बढ़ने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
रिफाइनरी और ईंधन निर्यात कारोबार पर संभावित प्रभाव
पेट्रोल पर शुल्क शून्य होने से इसके निर्यात से जुड़ी कंपनियों को पहले की तुलना में राहत मिल सकती है। वहीं, डीजल और एटीएफ पर बढ़े शुल्क से इन उत्पादों के निर्यात की लागत बढ़ेगी। ऐसे में रिफाइनरियों और निर्यातकों को नए शुल्क के अनुसार अपनी कारोबारी गणना करनी होगी।
कुल मिलाकर, पेट्रोलियम निर्यात शुल्क में किया गया यह बदलाव अलग-अलग ईंधनों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और घरेलू उपलब्धता के बीच संतुलन बनाने की सरकारी नीति को दर्शाता है। आगे भी वैश्विक बाजार की परिस्थितियों के आधार पर इन दरों की समीक्षा की जा सकती है।
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