भारत और रूस दशकों से रक्षा साझेदारी में एक-दूसरे के सबसे मजबूत सहयोगी रहे हैं। पुतिन के भारत दौरे ने इस सामरिक मित्रता को फिर से केंद्र में ला दिया है, जहां रक्षा खरीद, संयुक्त उत्पादन और रणनीतिक सैन्य तकनीक को प्राथमिकता दी जा रही है। रूस आज भी भारत की रक्षा जरूरतों में सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, और मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में यह साझेदारी और अधिक अहम हो गई है।
🇮🇳 भारत–रूस रक्षा साझेदारी क्यों महत्वपूर्ण?
सोवियत युग से लेकर वर्तमान तक भारत की वायु सेना, नौसेना और थल सेना के बड़े हिस्से में रूसी तकनीक और आधुनिक हथियार शामिल हैं।
रूस भारत को केवल सैन्य उत्पादक की तरह नहीं, बल्कि रणनीतिक तकनीकी भागीदार के रूप में समर्थन देता है — यही वजह है कि दोनों देश संयुक्त अनुसंधान व उत्पादन मॉडल की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
🔥 कौन से रक्षा समझौते चर्चा में हैं?
सूत्रों के अनुसार पुतिन के इस दौरे में भारत इन प्रमुख रक्षा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है —
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S-500 एयर डिफेंस सिस्टम: अंतरमहाद्वीपीय मिसाइलों को रोकने में सक्षम दुनिया की उन्नत प्रणाली
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Su-57 स्टेल्थ फाइटर जेट: 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की श्रेणी में भारत की संभावित एंट्री
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पनडुब्बी व नौसेना तकनीक ट्रांसफर
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हाइपरसोनिक तकनीक पर संयुक्त विकास
ये समझौते न सिर्फ भारतीय सेना की क्षमता बढ़ाएंगे बल्कि दीर्घकालिक रक्षा आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को भी गति देंगे।
🔧 मौजूदा संयुक्त परियोजनाएँ जो गति पकड़ रही हैं
भारत और रूस पहले से कई बड़े रक्षा कार्यक्रमों पर साथ काम कर रहे हैं, जिनमें शामिल हैं—
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टी-90 टैंकों का उत्पादन
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सुखोई-30 MKI निर्माण
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कामोव हेलीकॉप्टर आपूर्ति
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AK-203 राइफल उत्पादन (मेक इन इंडिया इकाई)
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ब्रह्मोस मिसाइल — भारत की सबसे सफल संयुक्त रक्षा परियोजना
ब्रह्मोस को आने वाले वर्षों में अन्य देशों को निर्यात करने की तैयारी भी भारत–रूस साझेदारी को नई वैश्विक पहचान दे सकती है।
⚔ सेनाओं का मिलिट्री कोऑपरेशन भी मजबूत
भारतीय और रूसी सेनाएँ केवल हथियारों के व्यापार तक सीमित नहीं हैं —
दोनों देश लगातार संयुक्त सैन्य अभ्यास भी करते हैं
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INDRA अभ्यास (ट्राई-सर्विस)
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वोस्तोक ड्रिल व अन्य मल्टीनेशनल ड्रिल्स
यह सहयोग दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे की रणनीतियों और तकनीकी क्षमताओं से परिचित कराता है।
