IPS कमलोचन कश्यप: नक्सलियों के लिए खौफ का नाम, रिटायरमेंट के बाद OSD बनकर फिर संभाली बड़ी जिम्मेदारी

IPS कमलोचन कश्यप प्रोफाइल: बस्तर में नक्सल विरोधी अभियानों के नायक, रिटायरमेंट के बाद भी सेवा में सक्रिय

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रिटायर्ड आईपीएस अफसर कमलोचन कश्यप
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छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने वाले अफसरों की सूची में IPS कमलोचन कश्यप का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। बस्तर जैसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में वर्षों तक तैनात रहकर उन्होंने नक्सलियों के नेटवर्क को गहरी चोट पहुंचाई। यही वजह है कि उनके नाम मात्र से ही माओवादी खेमों में खलबली मच जाती थी।

हाल ही में 1 जनवरी 2026 को सेवानिवृत्त होने के बावजूद, राज्य सरकार ने उनके अनुभव और रणनीतिक समझ को देखते हुए उन्हें पुलिस मुख्यालय में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (OSD) नियुक्त किया है। इस संबंध में शुक्रवार को आधिकारिक आदेश भी जारी कर दिया गया।

गांव से IPS बनने तक का सफर

IPS कमलोचन कश्यप बस्तर जिले के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखते हैं। प्रारंभिक शिक्षा गांव में और स्नातक की पढ़ाई जगदलपुर कॉलेज से पूरी की। वर्ष 1994 में उन्होंने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर डीएसपी के रूप में पुलिस सेवा की शुरुआत की।

नक्सल प्रभावित इलाकों में लंबी सेवा

अपने करियर के अधिकांश वर्ष उन्होंने नक्सल प्रभावित जिलों में बिताए। गरियाबंद, बीजापुर, दंतेवाड़ा और राजनांदगांव जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में उन्होंने बतौर एसडीओपी, सीएसपी, एसपी और बाद में डीआईजी के रूप में उल्लेखनीय कार्य किया।

दंतेवाड़ा में एसपी रहते हुए उन्होंने 78 मुठभेड़ों में 45 हार्डकोर नक्सलियों को मार गिराया। वहीं बीजापुर और राजनांदगांव में भी कई सफल ऑपरेशनों के दौरान 30 से अधिक माओवादियों का खात्मा हुआ।

पुरस्कार और सम्मान

उनकी बहादुरी और उत्कृष्ट सेवा के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया, जिनमें शामिल हैं:

  • राष्ट्रपति पुलिस पदक (वीरता)

  • राष्ट्रपति पुलिस पदक (विशिष्ट सेवा)

  • राष्ट्रपति पुलिस पदक (सराहनीय सेवा)

  • केंद्रीय गृह मंत्री दक्षता पदक

सादगी, रणनीति और स्थानीय समझ

कम बोलना, सटीक निर्णय लेना और प्रचार से दूर रहकर काम करना—यही IPS कश्यप की कार्यशैली रही। बस्तर के निवासी होने के कारण उन्हें स्थानीय बोली और सामाजिक संरचना की गहरी समझ थी, जिसने नक्सल अभियानों को और प्रभावी बनाया।

रिटायरमेंट के बाद भी जिम्मेदारी

सेवानिवृत्ति के बाद भी राज्य सरकार ने उन पर भरोसा जताया है। OSD के रूप में उनकी नई भूमिका यह दर्शाती है कि नक्सल विरोधी रणनीति में उनका अनुभव आज भी बेहद अहम माना जा रहा है।

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