होर्मुज संकट गहराया: खाड़ी देशों का नया तेल-गैस प्लान, भारत के IMEC से बदल सकती तस्वीर

CG DARSHAN
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पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा असर पड़ रहा है। ईरान, अमेरिका और इस्राइल के बीच बढ़ते टकराव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति अनिश्चित बनी हुई है, जिससे दुनिया भर में तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित हो रही है।

लगभग एक महीने से जारी इस संघर्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने स्पष्ट किया है कि ईरान में सैन्य लक्ष्य पूरे होने तक अभियान जारी रहेगा। इससे संकेत मिलता है कि होर्मुज पर संकट जल्द खत्म होने वाला नहीं है।

खाड़ी देशों की बढ़ती चिंता

होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर खाड़ी देश अब इस अहम मार्ग के विकल्प तलाशने में जुट गए हैं। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत जैसे देशों को आशंका है कि यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहा, तो उनके तेल निर्यात पर गंभीर असर पड़ सकता है।

वैकल्पिक सप्लाई रूट पर तेजी से काम

1. सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन
सऊदी अरब अपनी मौजूदा पाइपलाइन नेटवर्क को मजबूत कर लाल सागर के रास्ते तेल निर्यात बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है, जिससे होर्मुज पर निर्भरता कम की जा सके।

2. IMEC कॉरिडोर पर फोकस
India-Middle East-Europe Economic Corridor (IMEC) को सबसे बड़े दीर्घकालिक समाधान के रूप में देखा जा रहा है। यह कॉरिडोर भारत, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ते हुए एक नया व्यापार और ऊर्जा नेटवर्क तैयार करेगा।

3. यूएई का फूजैरह मार्ग
यूएई अपनी पाइपलाइन क्षमता बढ़ाकर तेल को सीधे ओमान की खाड़ी तक पहुंचाने की योजना बना रहा है, ताकि जोखिम कम किया जा सके।

4. इराक और तुर्किये के जरिए रूट
इराक-तुर्किये पाइपलाइन और अन्य क्रॉस-बॉर्डर मार्गों पर भी विचार जारी है, हालांकि इनकी लागत और सुरक्षा चिंताएं बड़ी चुनौती हैं।

5. नए टर्मिनल और ओमान कनेक्शन
लाल सागर पर नए निर्यात टर्मिनल और ओमान के बंदरगाहों तक पाइपलाइन विकसित करने के विकल्प भी चर्चा में हैं।

भारत के लिए अवसर क्यों?

इस पूरे घटनाक्रम में Narendra Modi की पहल IMEC कॉरिडोर को विशेष महत्व मिल रहा है। यह परियोजना भारत को वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन में एक प्रमुख भूमिका दिला सकती है।

IMEC के जरिए भारत को सुरक्षित, तेज और विविध ऊर्जा आपूर्ति मार्ग मिल सकते हैं, जिससे उसकी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक पहुंच दोनों मजबूत होंगी।

चुनौतियां और जोखिम

हालांकि इन परियोजनाओं को जमीन पर उतारना आसान नहीं है। भारी निवेश, जटिल इंजीनियरिंग और क्षेत्रीय राजनीति बड़ी बाधाएं हैं। विशेष रूप से सऊदी अरब और इस्राइल के बीच संतुलन बनाना इस योजना के लिए अहम रहेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये योजनाएं सफल होती हैं, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है और भारत इसमें प्रमुख भूमिका निभा सकता है।

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