अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने वैश्विक कूटनीति को प्रभावित करने वाले कई अहम बयान देकर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर हलचल बढ़ा दी है। ईरान के साथ जारी तनाव के बीच उन्होंने युद्ध रोकने और जल्द समझौते की उम्मीद जताई। खासतौर पर उनका यह बयान सुर्खियों में है कि समझौता होने पर वह स्वयं पाकिस्तान जाकर उस पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, जिसे एक बड़े कूटनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है।
भारत के संदर्भ में भी ट्रंप ने सकारात्मक संकेत दिए। उन्होंने Narendra Modi के साथ अपने संबंधों को मजबूत बताते हुए हालिया फोन वार्ता को “बेहद सार्थक” बताया। दोनों नेताओं के बीच पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक समुद्री मार्गों की सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित बनाए रखने पर जोर दिया गया, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
ईरान को लेकर ट्रंप का रुख मिश्रित नजर आया। एक ओर उन्होंने संबंधों को “बेहतर” बताया, वहीं दूसरी ओर उसकी सैन्य क्षमताओं में गिरावट का दावा करते हुए कहा कि ईरान की नौसेना को गंभीर नुकसान हुआ है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका का प्राथमिक उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है। ट्रंप ने संकेत दिया कि सप्ताहांत में होने वाली वार्ता इस दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है।
इसी बीच “डोनरो डॉक्ट्रिन” की अवधारणा फिर चर्चा में है, जिसे ट्रंप की नई विदेश नीति की आधारशिला माना जा रहा है। यह सिद्धांत ‘केवल अमेरिका के हित सर्वोपरि’ के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता है। इसकी प्रेरणा James Monroe के ऐतिहासिक मोनरो सिद्धांत से मानी जाती है, जिसने अमेरिकी विदेश नीति को दशकों तक प्रभावित किया है।
ट्रंप ने अपने कार्यकाल में 10 युद्ध रुकवाने का दावा भी किया, जिसमें इस्राइल-लेबनान संघर्ष में युद्धविराम शामिल है। पश्चिम एशिया में बदलते हालात और संभावित कूटनीतिक समझौतों के बीच, ट्रंप के ये बयान आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय कर सकते हैं।

