पश्चिम बंगाल चुनाव की मतगणना को लेकर उठे काउंटिंग स्टाफ विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के अधिकारों को पूरी तरह बरकरार रखा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने दो टूक कहा कि आयोग को अधिकारियों की नियुक्ति का पूरा अधिकार है और इसमें न्यायालय को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में किसी भी नए आदेश से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि मतगणना प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सभी राजनीतिक दलों के एजेंट मौके पर मौजूद रहते हैं। ऐसे में यह बहस गौण हो जाती है कि पर्यवेक्षक केंद्र सरकार का अधिकारी है या राज्य सरकार का। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग की जिम्मेदारी निष्पक्ष चुनाव कराना है, और इसी आधार पर उसे नियुक्ति से जुड़े निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
दरअसल, चुनाव आयोग ने मतगणना के लिए केंद्रीय कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर नियुक्त करने का निर्देश दिया था। इस फैसले को TMC ने चुनौती देते हुए दावा किया कि राज्य कर्मचारियों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। इसी आधार पर पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
सुनवाई के दौरान TMC की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि आयोग के सर्कुलर में केवल केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और यह निर्णय पक्षपातपूर्ण हो सकता है। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि नियमों में स्पष्ट प्रावधान है कि केंद्र या राज्य—दोनों के अधिकारी मतगणना में नियुक्त किए जा सकते हैं।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने यह भी कहा कि यदि चुनाव आयोग केवल केंद्रीय कर्मचारियों को नियुक्त करने का विकल्प चुनता है, तब भी इसे नियमों के विरुद्ध नहीं माना जा सकता। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता और अधिकारों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।

