भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ: जानिए कैसे ‘करो या मरो’ ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी

CG DARSHAN
CG DARSHAN 4 Min Read
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8 अगस्त 1942 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ने नया मोड़ लिया। मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में महात्मा गांधी ने करो या मरो का ऐतिहासिक आह्वान किया। यह केवल एक नारा नहीं था। यह अंग्रेजी शासन के खिलाफ अंतिम जनसंघर्ष का संदेश था। इस आह्वान ने लाखों भारतीयों को स्वतंत्रता के लिए एकजुट कर दिया। इसके बाद पूरे देश में आंदोलन तेजी से फैल गया और आजादी की लड़ाई को नई दिशा मिली।

मुख्य बातें

  • 8 अगस्त 1942 को कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया।
  • महात्मा गांधी ने “करो या मरो” का संदेश दिया।
  • अगले ही दिन शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • जनता ने स्वतः आंदोलन की कमान संभाल ली।
  • महिलाओं और युवाओं की भागीदारी उल्लेखनीय रही।
  • इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन पर व्यापक दबाव बनाया।

करो या मरो की पृष्ठभूमि क्या थी?

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने भारत को बिना अनुमति युद्ध में शामिल कर दिया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया। वहीं जापानी सेना एशिया में तेजी से आगे बढ़ रही थी। भारत की सुरक्षा भी चुनौती बन गई थी।

मार्च 1942 में ब्रिटेन ने क्रिप्स मिशन भेजा। भारतीय नेताओं को युद्ध के बाद सीमित अधिकार देने का प्रस्ताव रखा गया। कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया। नेताओं का मानना था कि भारत को तत्काल स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। इसके बाद निर्णायक आंदोलन की तैयारी शुरू हुई।

8 अगस्त 1942 का ऐतिहासिक फैसला

मुंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक हुई। इस बैठक में भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित हुआ। महात्मा गांधी ने देशवासियों से करो या मरो का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्त होने तक संघर्ष जारी रहना चाहिए।

यह संदेश कुछ ही घंटों में पूरे देश में फैल गया। लाखों लोग स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए।

करो या मरो का पूरे देश पर प्रभाव

9 अगस्त 1942 को गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और कई अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश सरकार को उम्मीद थी कि आंदोलन समाप्त हो जाएगा। लेकिन जनता ने आंदोलन की बागडोर स्वयं संभाल ली।

देशभर में प्रदर्शन, हड़ताल और सभाएं शुरू हो गईं। बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में आंदोलन सबसे अधिक प्रभावी रहा। करो या मरो का संदेश गांव-गांव तक पहुंच गया और लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई।

महिलाओं ने निभाई बड़ी भूमिका

नेताओं की गिरफ्तारी के बाद महिलाओं ने आंदोलन को आगे बढ़ाया।

  • अरुणा आसफ अली ने तिरंगा फहराकर आंदोलन को नई पहचान दी।
  • उषा मेहता ने गुप्त कांग्रेस रेडियो चलाया।
  • सुचेता कृपलानी ने भूमिगत कार्यकर्ताओं का नेतृत्व किया।
  • मातंगिनी हाजरा ने जुलूस का नेतृत्व करते हुए बलिदान दिया।

महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने आंदोलन को मजबूत बनाया।

एक नजर में

  • क्रिप्स मिशन की विफलता निर्णायक कारण बनी।
  • गांधीजी ने “करो या मरो” का संदेश दिया।
  • नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन और तेज हुआ।
  • कई क्षेत्रों में समानांतर सरकारें बनीं।
  • जनता ने अंग्रेजी शासन का खुलकर विरोध किया।
  • आंदोलन ने स्वतंत्रता की राह मजबूत की।

इतिहास में क्यों है विशेष महत्व?

इतिहासकारों के अनुसार, करो या मरो का संदेश भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे प्रभावशाली घटनाओं में शामिल है। इस आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को स्पष्ट संकेत दिया कि भारतीय अब विदेशी शासन स्वीकार नहीं करेंगे। बाद के वर्षों में आजाद हिंद फौज, नौसेना विद्रोह और बढ़ते जनदबाव ने स्वतंत्रता का मार्ग और मजबूत किया। इसलिए 1942 का यह आंदोलन भारतीय इतिहास का एक निर्णायक अध्याय माना जाता है।

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