भारत की जर्जर सड़कों और टोल वसूली पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने सवाल उठाया कि जब मुसाफिर 12 घंटे तक जाम में फंसे रहें तो उनसे टोल क्यों लिया जाए? कोर्ट ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को फटकार लगाते हुए कहा कि खराब सड़कों और लंबी देरी के बावजूद टोल टैक्स वसूलना जनता के भरोसे के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
चीफ जस्टिस बी.आर. गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि दिल्ली जैसे शहर में कुछ घंटे की बारिश ही व्यवस्था को ठप कर देती है। इसी तरह जब राष्ट्रीय राजमार्गों पर रखरखाव नहीं होता, तो आम लोग सबसे ज्यादा परेशान होते हैं।
NHAI की दलील और कोर्ट का रुख
NHAI की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि जाम एक लॉरी के पलटने से हुआ था, जिसे उन्होंने “एक्ट ऑफ गॉड” बताया। इस पर जस्टिस चंद्रन ने असहमति जताते हुए कहा कि दुर्घटना गड्ढे के कारण हुई, इसलिए इसे ईश्वरीय कृत्य नहीं कहा जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि 12 घंटे तक फंसा रहना केवल एक दुर्घटना का असर नहीं, बल्कि खराब प्रबंधन की देन है।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं के वकील और सीनियर एडवोकेट जयंत मुथराज ने कहा कि NHAI की प्राथमिक जिम्मेदारी सड़क की गुणवत्ता और सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करना है। इस स्थिति में टोल वसूली जनता के साथ अन्याय है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने भी आदेश दिया था कि खस्ताहाल सड़कों और गंभीर जाम की स्थिति में टोल वसूली नहीं हो सकती।
जनता के विश्वास का सवाल
केरल हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि NHAI और जनता का रिश्ता विश्वास पर आधारित है और खराब सड़कों पर टोल वसूली इस भरोसे को तोड़ती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी को दोहराते हुए कहा कि यह सिर्फ टोल टैक्स का मुद्दा नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और अधिकारों का मामला है।
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर फिलहाल फैसला सुरक्षित रखा है। लेकिन कोर्ट की सख्त टिप्पणियों से साफ है कि टोल वसूली नीति और सड़क प्रबंधन पर जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

