डॉ. एस. जयशंकर बोले — “संयुक्त राष्ट्र को बदलना होगा, नहीं तो यह अप्रासंगिक हो जाएगा”
भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने नई दिल्ली में आयोजित संयुक्त राष्ट्र सैन्य योगदान देने वाले देशों के सम्मेलन (UNTCC) में भाग लेते हुए एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि “संयुक्त राष्ट्र आज भी 1945 की सोच और संरचना में अटका हुआ है, जबकि दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है।” जयशंकर ने स्पष्ट किया कि यदि संयुक्त राष्ट्र को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखनी है, तो उसे विकासशील देशों की आवाज़ को प्रमुखता देनी होगी।
संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग
अपने संबोधन में विदेश मंत्री ने कहा कि “80 वर्षों में दुनिया में बड़ा परिवर्तन आया है। संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या चार गुना बढ़ चुकी है, लेकिन इसकी कार्यप्रणाली आज भी पुरानी है। जो संस्थाएं समय के साथ नहीं बदलतीं, वे अप्रासंगिक हो जाती हैं।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि संयुक्त राष्ट्र को अधिक समावेशी, लोकतांत्रिक और सहभागी संगठन बनना चाहिए, जो आज की वैश्विक परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व कर सके।
शांति अभियानों में भारत की भूमिका
डॉ. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भारत के योगदान पर गर्व व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “भारतीय शांति सैनिक बहुपक्षवाद के सच्चे पथप्रदर्शक हैं, जिन्होंने मानवता की सेवा में अपने प्राणों की आहुति दी है।”
उन्होंने सुझाव दिया कि शांति अभियानों से जुड़े निर्णयों में उन देशों की राय भी शामिल की जानी चाहिए, जहाँ ये अभियान चलाए जाते हैं और जिन देशों के सैनिक इसमें भाग लेते हैं।
विकासशील देशों की आवाज़ बुलंद करने की जरूरत
जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह वैश्विक दक्षिण (Global South) की आकांक्षाओं को कितनी गंभीरता से सुनता और अपनाता है। उन्होंने जोर दिया कि “विकासशील देशों को निर्णय प्रक्रिया में समान भागीदारी मिलनी चाहिए।”
भारत की वैश्विक दृष्टि
डॉ. जयशंकर का यह वक्तव्य भारत की संतुलित, न्यायपूर्ण और समावेशी विश्व व्यवस्था की परिकल्पना को दर्शाता है। भारत का मानना है कि वैश्विक संस्थानों में सुधार केवल आवश्यक नहीं, बल्कि समय की मांग बन चुका है।
