नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (MGNREGA) का नाम बदलने के प्रस्ताव ने संसद से लेकर सियासी गलियारों तक बहस छेड़ दी है। कांग्रेस ने इस फैसले को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं और इसे केवल री-ब्रांडिंग की कवायद बताया है।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने संसद परिसर में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि किसी भी योजना का नाम बदलने से सरकारी संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। उन्होंने पूछा कि जब देश के सामने बेरोजगारी, महंगाई और प्रदूषण जैसी गंभीर समस्याएं हैं, तब नाम बदलने जैसे फैसलों की प्राथमिकता क्यों तय की जा रही है।
प्रियंका गांधी ने यह भी कहा कि महात्मा गांधी केवल एक नाम नहीं, बल्कि देश की विचारधारा का प्रतीक हैं। ऐसे में योजना से उनका नाम हटाने के पीछे की सोच समझ से परे है। उनके अनुसार, संसद का बहुमूल्य समय जनता से जुड़े मुद्दों की बजाय ऐसे विषयों में नष्ट हो रहा है।
वहीं, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण पर सरकार की ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) नीति को नाकाफी करार दिया। उन्होंने कहा कि GRAP केवल आपात स्थिति से निपटने का माध्यम है, जबकि प्रदूषण की रोकथाम के लिए दीर्घकालिक नीति की जरूरत है।
मनरेगा के नाम परिवर्तन पर तृणमूल कांग्रेस और वाम दलों ने भी विरोध दर्ज कराया है। टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने इसे महात्मा गांधी के योगदान का अपमान बताया, जबकि सीपीआई(एम) ने आरोप लगाया कि सरकार अधिकार-आधारित ढांचे को कमजोर कर राज्यों पर जिम्मेदारी डालना चाहती है।
विपक्ष का दावा है कि फंड कटौती और संरचनात्मक बदलाव से ग्रामीण रोजगार व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा। इन मुद्दों को लेकर आने वाले समय में राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।
