India–EU FTA समझौता: ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ से भारत-यूरोप रिश्तों में आएगा ऐतिहासिक बदलाव

भारत–यूरोपीय संघ FTA डील: व्यापार और रणनीति में नई शुरुआत का संकेत

CG DARSHAN
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भारत और यूरोपीय संघ के बीच वर्षों से चल रही मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की प्रक्रिया अब निर्णायक चरण में पहुंच चुकी है। दोनों पक्ष आज एक ऐसे बड़े समझौते की घोषणा कर सकते हैं, जिसे कूटनीतिक हलकों में “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा जा रहा है। यह समझौता भारत और यूरोप के बीच आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को नई गति देने वाला माना जा रहा है।

यह डील ऐसे समय पर सामने आ रही है, जब वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति तेजी से बदल रही है। भारत और यूरोपीय संघ मिलकर दुनिया की एक बड़ी आर्थिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। दोनों क्षेत्र मिलकर वैश्विक व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालते हैं, जबकि दुनिया की चौथाई आबादी इन्हीं क्षेत्रों में निवास करती है।

रक्षा क्षेत्र में सहयोग बना अहम आधार

इस समझौते से पहले रक्षा सहयोग को लेकर भी महत्वपूर्ण बातचीत हुई है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और यूरोपीय संघ की सुरक्षा मामलों की प्रमुख काजा कालास के बीच हुई बैठक में रक्षा सप्लाई चेन को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया।

बैठक में भरोसेमंद रक्षा नेटवर्क तैयार करने, आधुनिक क्षमताओं के विकास और सुरक्षा साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए सप्लाई चेन के एकीकरण पर चर्चा हुई। राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि भारत और यूरोपीय संघ रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक सहयोग को नई ऊंचाई तक ले जाना चाहते हैं।

उच्चस्तरीय कूटनीति से मिला राजनीतिक समर्थन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा से हैदराबाद हाउस में मुलाकात की। यह मुलाकात भारत–ईयू शिखर सम्मेलन से पहले हुई, जिससे इस समझौते को मजबूत राजनीतिक समर्थन मिला है।

शिखर सम्मेलन में दोनों पक्ष एक संयुक्त रणनीतिक रोडमैप अपनाने पर सहमत हो सकते हैं, जिसमें व्यापार, निवेश, सुरक्षा, तकनीक और सतत विकास को प्राथमिकता दी जाएगी।

19 साल बाद ऐतिहासिक निष्कर्ष

भारत और यूरोपीय संघ के बीच FTA की बातचीत की शुरुआत 2007 में हुई थी। कई दौर की बातचीत और लंबी रुकावट के बाद 2022 में इसे दोबारा शुरू किया गया और अब 2026 में जाकर यह समझौता अंतिम रूप में पहुंचा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील व्यापार अवरोधों को कम करेगी, निवेश के नए रास्ते खोलेगी और दोनों अर्थव्यवस्थाओं को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाएगी।

कुल मिलाकर, यह समझौता भारत और यूरोपीय संघ के रिश्तों में एक नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

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