महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव एक बार फिर राजनीतिक सहमति के अभाव में अधूरा रह गया। लोकसभा में हुए मतदान में विधेयक को समर्थन तो मिला, लेकिन यह संवैधानिक रूप से आवश्यक दो-तिहाई बहुमत तक नहीं पहुंच सका। इसी कारण इसे पारित नहीं माना गया, जिसके बाद सदन के भीतर और बाहर सियासी बयानबाजी तेज हो गई।
मतदान प्रक्रिया में बड़ी संख्या में सांसदों ने हिस्सा लिया और समर्थन में पड़े मत विरोध से अधिक रहे, लेकिन तय सीमा पार न कर पाने के कारण पूरा प्रयास निष्फल साबित हुआ। इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि महिला प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी राजनीतिक एकजुटता अभी दूर है। लोकसभा अध्यक्ष Om Birla ने नियमों का हवाला देते हुए स्थिति स्पष्ट की, जिससे विवाद और गहरा गया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता Shashi Tharoor ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण लागू करने के पक्ष में है, लेकिन सरकार द्वारा इसे परिसीमन से जोड़ना उचित नहीं है। उनके अनुसार, परिसीमन एक संवेदनशील और दीर्घकालिक प्रभाव वाला विषय है, जिस पर सभी हितधारकों के साथ विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दोनों मुद्दों को जोड़कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की गई है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए Kiren Rijiju ने विपक्ष पर कड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यह विधेयक महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम था, लेकिन विपक्ष के रवैये ने इसे विफल कर दिया। उन्होंने इस स्थिति को देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि जनता, खासकर महिलाएं, इसका जवाब जरूर देंगी।
महिला आरक्षण विधेयक का यह घटनाक्रम एक बार फिर भारतीय राजनीति में सहमति निर्माण की चुनौती और संवेदनशील मुद्दों पर विभाजन को उजागर करता है। आने वाले समय में यह मुद्दा और अधिक राजनीतिक बहस और रणनीति का केंद्र बन सकता है।

