दुनिया के प्रमुख उद्योगपति एलन मस्क ने हाल ही में भारत की घटती जन्म दर को लेकर चिंता जताई है। उनका मानना है कि यदि जन्म दर लंबे समय तक रिप्लेसमेंट स्तर से नीचे बनी रहती है, तो भविष्य में जनसंख्या वृद्धि धीमी पड़ सकती है। इसी वजह से यह विषय एक बार फिर नीति निर्माताओं और जनसंख्या विशेषज्ञों के बीच चर्चा का केंद्र बन गया है।
क्यों कम हो रहे हैं नए जन्म?
विशेषज्ञों के अनुसार शिक्षा के बढ़ते स्तर, महिलाओं की कार्यक्षेत्र में बढ़ती भागीदारी, शहरीकरण और परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता ने परिवारों के आकार को छोटा किया है। इसके अलावा बढ़ती महंगाई, आवास की लागत और बच्चों की परवरिश पर बढ़ता खर्च भी घटती जन्म दर के पीछे अहम कारण माने जा रहे हैं।
भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग तस्वीर
देशभर में प्रजनन दर समान नहीं है। दक्षिण भारत और महानगरीय क्षेत्रों में जन्म दर काफी कम हो चुकी है, जबकि कुछ उत्तरी राज्यों में यह अभी भी अपेक्षाकृत अधिक है। शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और आर्थिक विकास के स्तर में अंतर के कारण घटती जन्म दर का प्रभाव राज्यों में अलग-अलग दिखाई देता है।
अर्थव्यवस्था और रोजगार पर क्या होगा प्रभाव?
वर्तमान में भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि घटती जन्म दर का यह रुझान जारी रहा तो आने वाले वर्षों में श्रम शक्ति की वृद्धि धीमी हो सकती है। इससे उत्पादन, कर संग्रह और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
जापान, चीन और दक्षिण कोरिया से क्या सीख सकता है भारत?
दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश पहले ही कम जन्म दर की चुनौती का सामना कर चुके हैं। जापान, दक्षिण कोरिया और चीन ने आर्थिक प्रोत्साहन, मातृत्व सहायता और परिवार कल्याण योजनाओं पर अरबों डॉलर खर्च किए, लेकिन घटती जन्म दर को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पाए। यही कारण है कि भारत के लिए समय रहते संतुलित नीतियां बनाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सरकारों के सामने क्या हैं विकल्प?
विशेषज्ञों का मानना है कि रोजगार सुरक्षा, मातृत्व अवकाश, सस्ती बाल देखभाल सुविधाएं और परिवार समर्थक नीतियां भविष्य में अहम भूमिका निभा सकती हैं। साथ ही युवाओं के लिए बेहतर आर्थिक अवसर पैदा करना भी जरूरी होगा, ताकि घटती जन्म दर के कारण उत्पन्न होने वाली जनसांख्यिकीय चुनौतियों का प्रभाव कम किया जा सके।

