छत्तीसगढ़ में 13 साल पुराने झीरम कांड को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। बिलासपुर में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अदालत के फैसले को लेकर कांग्रेस के सवालों पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यदि किसी के पास घटना से जुड़े पुख्ता सबूत मौजूद थे, तो उन्हें जांच एजेंसी के सामने रखना चाहिए था।
मुख्यमंत्री ने यह टिप्पणी उस समय की है, जब विशेष NIA अदालत ने मामले में 10 आरोपियों को दोषी करार दिया है। लंबे समय तक चली सुनवाई में 100 से ज्यादा गवाहों के बयान दर्ज किए गए। अब अदालत की अगली नजर दोषियों को मिलने वाली सजा पर है।
CM साय ने ‘जेब में सबूत’ वाले बयान पर साधा निशाना
बेलतरा विधानसभा क्षेत्र में आयोजित तीजा-पोरा कार्यक्रम में पहुंचे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कांग्रेस पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि सत्ता में रहते हुए कांग्रेस के नेताओं की ओर से मामले से संबंधित महत्वपूर्ण सबूत होने के दावे किए जाते थे।
सीएम का सवाल है कि यदि वास्तव में ऐसे सबूत उपलब्ध थे, तो उन्हें जांच एजेंसी के पास क्यों नहीं रखा गया?
उन्होंने कहा कि अदालत ने लंबी प्रक्रिया के बाद अपना निर्णय दिया है। इसलिए न्यायालय के फैसले पर सवाल उठाने के बजाय कानूनी प्रक्रिया का सम्मान किया जाना चाहिए।
करीब 13 साल चली मामले की सुनवाई
झीरम घाटी नरसंहार से जुड़े मामले की न्यायिक प्रक्रिया काफी लंबी रही। घटना 25 मई 2013 को हुई थी, जब कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला बस्तर के दरभा क्षेत्र से गुजर रहा था।
माओवादियों ने काफिले को निशाना बनाकर बड़ा हमला किया था। इस हमले में कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं सहित बड़ी संख्या में लोगों की जान गई थी। घटना के बाद पूरे देश में इसकी चर्चा हुई और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठे।
मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA को सौंपी गई थी। इसके बाद जांच और अदालती कार्यवाही लंबे समय तक चलती रही।
100 से अधिक गवाहों के बयान हुए दर्ज
कोर्ट में चली सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से बड़ी संख्या में गवाह पेश किए गए। रिपोर्ट के अनुसार 100 से अधिक गवाहों के बयान अदालत में दर्ज हुए।
लंबी सुनवाई के बाद विशेष अदालत ने 10 आरोपियों को दोषी ठहराया है। अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण चरण दोषियों की सजा तय करना है।
16 सितंबर को अदालत सजा को लेकर अपना फैसला सुना सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मामले पर कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर नजर बनी रहेगी।
25 मई 2013 को क्या हुआ था?
झीरम घाटी नरसंहार की शुरुआत 25 मई 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान हुई थी। उस समय छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने वाले थे और कांग्रेस राज्य में व्यापक राजनीतिक अभियान चला रही थी।
सुकमा में कार्यक्रम के बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला जगदलपुर की ओर बढ़ रहा था। काफिले में बड़ी संख्या में वाहन और पार्टी के नेता-कार्यकर्ता मौजूद थे।
दरभा के झीरम इलाके में पहुंचने के बाद माओवादियों ने काफिले पर हमला कर दिया। अचानक हुए इस हमले ने राज्य की राजनीति को हिलाकर रख दिया।
किन बड़े नेताओं की गई थी जान?
इस हमले में कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और उनके बेटे दिनेश पटेल की मौत हुई थी। पूर्व मंत्री और आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा भी हमले में मारे गए।कई अन्य नेता और कार्यकर्ता भी इस हिंसक घटना का शिकार हुए। पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल भी हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे और बाद में उनका निधन हो गया।
घटना के बाद बस्तर में सुरक्षा और नक्सल समस्या को लेकर केंद्र तथा राज्य सरकारों के सामने कई गंभीर चुनौतियां खड़ी हुईं।
कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस और सरकार आमने-सामने
अदालत के फैसले के बाद झीरम घाटी नरसंहार को लेकर राजनीतिक बयानबाजी बढ़ गई है। सरकार की ओर से जहां अदालत के निर्णय को न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम बताया जा रहा है, वहीं कांग्रेस इस मामले के दूसरे पहलुओं को लेकर सवाल उठाती रही है।
मुख्यमंत्री साय ने कांग्रेस से कहा कि यदि उसके पास घटना से जुड़े प्रमाण थे तो उन्हें जांच के दौरान सामने रखना चाहिए था। उनका जोर इस बात पर है कि अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद फैसला सुनाया है।
दूसरी ओर, मामले से जुड़े राजनीतिक सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। इसी वजह से झीरम कांड छत्तीसगढ़ की राजनीति में आज भी संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।
23 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों पर भी CM ने दी जानकारी
बिलासपुर दौरे के दौरान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों के मामले पर भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 23 संदिग्ध लोगों को रायपुर के डिटेंशन सेंटर में रखा गया है।
इन लोगों की पहचान और नागरिकता का सत्यापन किया जाएगा। यदि जांच में उनके बांग्लादेशी नागरिक होने की पुष्टि होती है, तो नियमों के अनुसार उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
16 सितंबर को आएगा अगला अहम फैसला
फिलहाल झीरम घाटी नरसंहार मामले में अदालत द्वारा 10 आरोपियों को दोषी ठहराया जाना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव है। अब 16 सितंबर को होने वाली सुनवाई पर सबकी निगाहें हैं।
इस तारीख को अदालत दोषियों की सजा को लेकर फैसला कर सकती है। इसके साथ ही मामले में आगे कानूनी विकल्प भी खुले रहेंगे।
13 साल पुरानी इस घटना से जुड़े राजनीतिक सवालों के कारण आने वाले दिनों में यह मुद्दा छत्तीसगढ़ की सियासत में फिर सुर्खियों में रह सकता है।

