अमेरिकी राजनीति और वैश्विक व्यापार पर असर डालने वाला बड़ा फैसला आया है। फेडरल अपील कोर्ट ने डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति पर रोक लगाते हुए राष्ट्रपति की असीमित शक्तियों को चुनौती दी है। अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति को आपातकालीन अधिकार अवश्य हैं, लेकिन उन शक्तियों के नाम पर टैरिफ लागू करना कानूनी सीमा से बाहर है।
डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रैल में ‘लिबरेशन डे’ का ऐलान करते हुए लगभग सभी ट्रेड पार्टनर्स पर 10% बेसलाइन टैरिफ लगाया था। जिन देशों से अमेरिका का व्यापार घाटा था, उन पर 50% तक रेसिप्रोकल टैरिफ लागू कर दिया गया। कुछ देशों जैसे जापान, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने समझौता किया, जबकि लाओस पर 40% और अल्जीरिया पर 30% टैरिफ जारी रहा।
फेडरल कोर्ट ने 7-4 के बहुमत से यह फैसला दिया कि ट्रंप ने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) की आड़ लेकर अपनी सीमा से बाहर जाकर कदम उठाए। अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति को टैक्स और टैरिफ लगाने का अधिकार कभी कांग्रेस ने नहीं दिया। कोर्ट ने टैरिफ को तुरंत खत्म करने का आदेश तो नहीं दिया, लेकिन उन्हें 14 अक्टूबर तक यथावत रखने की अनुमति दी ताकि ट्रंप प्रशासन सुप्रीम कोर्ट तक अपील कर सके।
ट्रंप प्रशासन ने यह दलील दी कि 1970 के दशक में राष्ट्रपति निक्सन को भी इसी तरह टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया था। लेकिन न्यूयॉर्क ट्रेड कोर्ट और अब फेडरल अपील कोर्ट दोनों ने इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि कांग्रेस का इरादा कभी भी राष्ट्रपति को ‘असीमित शक्तियां’ देने का नहीं रहा। हालांकि चार जजों ने असहमति जताते हुए कहा कि 1977 का कानून असंवैधानिक नहीं है। इसका मतलब यह है कि ट्रंप के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प अब भी मौजूद है।
यह फैसला अमेरिकी व्यापार नीति और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के लिए अहम साबित हो सकता है। क्योंकि पहले ही ट्रंप की टैरिफ नीति ने अमेरिकी बाजारों, उपभोक्ताओं और वैश्विक व्यापार जगत में अस्थिरता पैदा कर दी थी। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस विवाद का अंतिम रुख तय करेगा।
