पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रणनीति से जुड़ी संस्था I-PAC पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस दौरान ईडी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के समक्ष घटनाक्रम को गंभीर बताते हुए राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े किए।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ को संबोधित करते हुए तुषार मेहता ने कहा कि यह मामला केवल एक जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि जब भी केंद्रीय एजेंसियां अपने वैधानिक अधिकारों का प्रयोग करती हैं, तब उन्हें बाधाओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इस तरह के हस्तक्षेप से जांच एजेंसियों और केंद्रीय बलों का मनोबल प्रभावित होता है।
सॉलिसिटर जनरल ने अदालत से मांग की कि घटना के समय मौके पर मौजूद अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं, ताकि एक स्पष्ट संदेश जाए। उन्होंने यह भी कहा कि I-PAC कार्यालय से संदिग्ध और आपत्तिजनक सामग्री मिलने के संकेत मिले हैं, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसी बीच, प्रवर्तन निदेशालय ने एक अलग याचिका के माध्यम से पश्चिम बंगाल के डीजीपी राजीव कुमार के निलंबन की मांग की है। ईडी का आरोप है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं किया और एजेंसी के काम में बाधा उत्पन्न की। इसके साथ ही, ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से DoPT और गृह मंत्रालय को निर्देश जारी करने की अपील की है, ताकि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो सके।
यह पूरा विवाद 8 जनवरी की उस कार्रवाई से जुड़ा है, जब ईडी ने कोलकाता के सॉल्ट लेक क्षेत्र में स्थित I-PAC कार्यालय और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के आवास पर कोयला तस्करी मामले में छापेमारी की थी। ईडी का दावा है कि जांच के दौरान उसके काम में व्यवधान डाला गया। हालांकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों को सिरे से नकारा है। वहीं, पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा ईडी अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज किए जाने से मामला और अधिक जटिल हो गया है।
