केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने के बाद राजनीतिक स्तर पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। प्रस्तावित संशोधन के अंतर्गत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के समान वैधानिक संरक्षण प्रदान किए जाने का प्रावधान शामिल है। इसके अनुसार ‘वंदे मातरम’ के गायन में बाधा उत्पन्न करना दंडनीय श्रेणी में आएगा।
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ की प्रकृति तथा संवैधानिक संदर्भ अलग-अलग हैं। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी वक्तव्य में कहा कि ‘जन गण मन’ भारत और उसके नागरिकों की सामूहिक पहचान को प्रतिबिंबित करता है, जबकि ‘वंदे मातरम’ धार्मिक प्रतीकात्मकता से संबद्ध रचना है।
ओवैसी ने संविधान की प्रस्तावना का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संविधान “हम भारत के लोग” शब्दों से आरंभ होता है। उनके अनुसार संविधान सभा ने प्रस्तावना को किसी धार्मिक अथवा राजशाही स्वरूप से जोड़ने वाले सुझावों को स्वीकार नहीं किया था। उन्होंने कहा कि भारतीय गणराज्य की संरचना नागरिक आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित है।
अपने वक्तव्य में उन्होंने यह भी कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रगान के चयन को लेकर विभिन्न राष्ट्रीय नेताओं के बीच व्यापक विचार-विमर्श हुआ था। ओवैसी के अनुसार कई नेताओं ने ‘जन गण मन’ को अधिक व्यापक और समावेशी दृष्टिकोण वाला माना था। उन्होंने ‘वंदे मातरम’ के ऐतिहासिक संदर्भों का भी उल्लेख किया।
भाजपा की ओर से तेलंगाना इकाई के अध्यक्ष एन रामचंदर राव ने ओवैसी की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रति विरोधात्मक रुख राष्ट्रीय एकीकरण की भावना के अनुरूप नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम’ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा ऐतिहासिक प्रतीक रहा है और इसका सम्मान व्यापक राष्ट्रीय भावना का हिस्सा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह विषय संवैधानिक व्याख्या, सांस्कृतिक पहचान तथा राष्ट्रीय प्रतीकों के संरक्षण से जुड़े व्यापक विमर्श को प्रभावित कर सकता है। प्रस्तावित संशोधन पर आगे संसदीय और राजनीतिक स्तर पर चर्चा की संभावना बनी हुई है।

