भारत के 14 शहर हीटवेव के बढ़ते खतरे में, ऑक्सफोर्ड अध्ययन ने जताई चिंता

CG DARSHAN
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दुनिया के बड़े शहरों पर किए गए एक नए अध्ययन में भारत के 14 शहर उच्च हीट जोखिम वाली श्रेणी में रखे गए हैं। शोध के अनुसार बढ़ता तापमान, हरियाली की कमी और कमजोर शहरी ढांचा मिलकर इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह चुनौती सार्वजनिक स्वास्थ्य और शहरी विकास दोनों को प्रभावित कर सकती है।

मुख्य बातें

  • 205 वैश्विक शहरों का विश्लेषण किया गया।
  • अहमदाबाद दुनिया का दूसरा सबसे जोखिम वाला शहर।
  • भारत के कई औद्योगिक और आईटी शहर सूची में शामिल।
  • सामाजिक और आर्थिक स्थिति भी जोखिम बढ़ाती है।
  • विशेषज्ञों ने प्राकृतिक कूलिंग उपाय अपनाने की सलाह दी।

H2: भारत के 14 शहर क्यों बने चिंता का कारण?

अध्ययन में पाया गया कि केवल अत्यधिक तापमान ही जोखिम का आधार नहीं है। जिन शहरों में हरित क्षेत्र कम हैं, कंक्रीट का विस्तार अधिक है और बुनियादी सुविधाएं सीमित हैं, वहां हीटवेव का प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है। अहमदाबाद, जयपुर, नागपुर, पुणे, चेन्नई, बेंगलुरु, कानपुर और लखनऊ सहित कई प्रमुख शहर इस सूची में शामिल हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, बुजुर्ग, बच्चे और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे क्षेत्रों में कूलिंग सुविधाओं की कमी भी जोखिम को बढ़ाती है।

H3: भारत के 14 शहर के लिए क्या हैं प्रमुख सुझाव?

शोधकर्ताओं ने कहा है कि शहरों में वृक्षारोपण बढ़ाने, खुले हरित क्षेत्रों का विस्तार करने और ऊर्जा दक्ष भवनों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इसके साथ ही पारंपरिक कूलिंग तकनीकों को अपनाने पर भी जोर दिया गया है। उनका मानना है कि केवल एयर कंडीशनर पर निर्भर रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता।

रिपोर्ट में क्या सामने आया?

अध्ययन में इराक का अल बसरा सबसे अधिक जोखिम वाला शहर बताया गया है, जबकि अहमदाबाद दूसरे स्थान पर है। वहीं बैंकॉक और जेद्दा जैसे शहरों में अधिक तापमान होने के बावजूद बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और मजबूत बुनियादी ढांचे के कारण जोखिम अपेक्षाकृत कम पाया गया। दूसरी ओर, भारत के 14 शहर सहित कई विकासशील क्षेत्रों में सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों ने हीट जोखिम को बढ़ाया है।

एक नजर में

  • हीटवेव का असर केवल तापमान पर निर्भर नहीं।
  • हरियाली और बुनियादी ढांचा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • प्राकृतिक कूलिंग उपायों को प्राथमिकता देने की सलाह।
  • कमजोर वर्गों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की आशंका।
  • जलवायु परिवर्तन के साथ जोखिम बढ़ने की संभावना।

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